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श्री शिवाजी सिंह जी

आचार्य शिवाजी सिंह भारतीय इतिहास, पुरातत्व एवं संस्कृति के एक प्रतिष्ठित विद्वान रहे हैं। उन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय तथा बाद में दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय में लगभग चार दशकों (1956 से 1995) तक अध्यापन एवं शोध-निर्देशन का कार्य किया। अपने दीर्घ अकादमिक जीवन में उन्होंने इतिहास एवं पुरातत्व के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

भारत और यूनान सरकारों के मध्य विद्वान-विनिमय कार्यक्रम के अंतर्गत वे दो वर्षों (1969–71) तक यूनान की राजधानी एथेंस में रहे। इस अवधि में उन्होंने ग्रीक भाषा तथा पुरातत्व का गहन अध्ययन किया। इसके अतिरिक्त उन्होंने मिस्र, यूनान, इटली, स्विट्ज़रलैंड, फ्रांस, इंग्लैंड एवं अमेरिका सहित अनेक देशों की शैक्षणिक यात्राएँ कीं, जहाँ उन्होंने पुरातात्त्विक स्थलों, संग्रहालयों एवं पुस्तकालयों का विस्तृत निरीक्षण एवं अध्ययन किया।

आचार्य शिवाजी सिंह ने देश-विदेश में आयोजित अनेक राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियों में शोध-पत्र प्रस्तुत किए। साथ ही उन्होंने कुछ संगोष्ठियों का उद्घाटन एवं विषय-प्रवर्तन भी किया। वैदिक साहित्य और भारतीय ऐतिहासिक पुरातत्व का समन्वय उनका प्रिय एवं विशिष्ट शोध-विषय रहा।

दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के प्राचीन इतिहास, पुरातत्व एवं संस्कृति विभाग से सेवानिवृत्ति के पश्चात भी वे इसी विषय पर सक्रिय शोध कार्य में संलग्न रहे। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अंतर्गत उन्होंने “वैदिक हेरिटेज इन आर्कियोलॉजी” शीर्षक एक महत्त्वपूर्ण शोध-परियोजना का संचालन किया। इसके अतिरिक्त भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली के वरिष्ठ फेलो के रूप में उन्होंने “ऋग्वैदिक एवं हड़प्पा सभ्यता : ज्यामितीय कलाकृतियाँ” विषय पर एक अन्य शोध-परियोजना को पूर्ण किया।

इन शोध-कार्यों से संबंधित उनका प्रमुख ग्रंथ ऋग्वेद : एन आर्कियोलॉजिकल स्टडी विद्वत् जगत में विशेष रूप से सराहा गया। उनकी अन्य प्रमुख प्रकाशित कृतियों में Evolution of Smriti Law (1972) तथा Idols, Paradigms and New Archaeology (1985) उल्लेखनीय हैं।

इस प्रकार आचार्य शिवाजी सिंह का जीवन एवं कृतित्व भारतीय इतिहास, पुरातत्व और वैदिक अध्ययन के क्षेत्र में एक अमूल्य धरोहर के रूप में स्थापित है।